कहते हैं कि ईश्वर भाव का भूखा होता है ना उसको प्रसाद की आवश्यकता ना उसको पुष्पों की आवश्यकता बस मन में श्रद्धा का एक बीज होना आवश्यक है इसी से जुड़ी हुई आज हम एक कहानी जो मीराबाई के प्रसंग से ली गई है आपके समने रखने जा रहा हूं
एक बार की बात है कि भगवान विष्णु शेषनाग की शैया पर छीरसागर में विश्राम कर रहे थे तथा देवी लक्ष्मी उनके चरणों को दाब रही थी कि तभी अचानक उन्होंने देखा कि भगवान विष्णु के नीले शरीर पर अनेक छोटे छोटे लाल निशान उत्पन्न हो गए जैसे कि उनको किसी ने जलाया होगा यह निशानों की संख्या लाखों-करोड़ों में थी या देखकर लक्ष्मी जी ने भगवान से पूछा कि स्वामी यह आपको क्या हो गया भगवान विष्णु मुस्कुराए और उन्होंने उत्तर दिया सभ्य करें सब कुशल है और मंद मंद मुस्कान न लगे लक्ष्मी जी बड़ी अचरज में पड़ गई और सोचने लगी कि इनको कष्ट भी नहीं होता तभी अचानक उन्होंने देखा कि निशान धीरे धीरे कम होने लगे और समाप्त हो गए अब लक्ष्मी जी को इस घटना के विषय में जानने की उत्सुकता बढ़ी तो उन्होंने आंख बंद कर ध्यान लगाकर देखा की मीराबाई भगवान कृष्ण की प्रतिमा लिए गर्म रेत पर दौड़ते हुए जा रही थी पर जहां-जहां वे पैर रखती वहां पर स्वयं कमल का फूल उत्पन्न हो जाता और मीराबाई रेत पर दौड़ती हुई आगे निकल जाती उनके पीछे कुछ सैनिक पड़े हुए थे जो उनको पकड़ने की चेष्टा कर रहे थे अचानक मीराबाई गिरी और वह भगवान कृष्ण की मूर्ति रेत में गिर गई जिस कारण भगवान विष्णु के शरीर में लाल निशान उत्पन्न हो गए मीराबाई ने तुरंत उसे उठाया और भागते हुए एक पेड़ के छाव में छिप गई और भगवान कृष्ण की मूर्ति को हाथ में लेकर रोने लगी जैसे जैसे उनके यहां से भगवान कृष्ण की मूर्ति पर गिरते भगवान विष्णु के लाल निशान समाप्त होते जाते लक्ष्मी जी ध्यान से बाहर आती हैं और भगवान से पूछती है यह कैसी भक्ति है तो भगवान विष्णु मुस्कुराते हुए कहते हैं की मूर्ति में मैं और मुझ में मीरा और मीरा में मैं और मुझ में आप और आप में मैं संसारऔर मेरे में संसार है
Thursday, July 6, 2017
भाव की भूख
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