कभी-कभी जीवन में हम लोगों को ऐसी सामग्री का रसास्वादन होता है कि वह और उसका स्वाद मन मस्तिष्क में बस जाता है इसी पर आधारित हमारी यह कहानी ""वो कचौड़ी" आपके समक्ष रखने जा रहा हूं आनंद लीजिएगा--
सुबह स्नान कर जल्दी घर से निकल गया और अपने कार्य क्षेत्र में व्यस्त हो कर भूख को कुछ हद तक भूल गया समय गुजरा उधर अग्नि अब प्रज्वलित होने लगी जिस को शांत करना अब हमें हमारा प्रथम कर्तव्य लगने लगा जो अब सहन के बाहर जा रही थी बाहर निकल कर भोजन की तलाश में इधर-उधर भटकने लगा ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे मैं किसी जंगल में खड़ा हूं हमारे समक्ष वृक्ष को अनेक है पर यह पता नहीं कि किस वृक्ष का फल खाने योग्य है देखने में सभी सुंदर लालिमा लिए हुए जो मुख को लार से भरने के लिए काफी था अब मात्र खुशबू से उन पदार्थों का मन मस्तिष्क चित्रण करने लगा था और उसके स्वाद का अनुभव करते हुए उसके प्रति आकर्षण शक्ति को बढ़ाने लगा था कुछ दूर और चला और देखा कि एक ठेली पर बहुत से लोग खड़े हुए जिन को देख कर मेरे कदम स्वता ही बढ़ने लगे ऐसा लग रहा था कि हमारी नासिका ग्रंथि पागल हो गई है और मुझे उस ओर खींचने लगी है अब मैं बढ़ता ही चला गया और पास जाकर देखा कि गरमा गरम कचौड़ियां निकल रही है और उसकी खुशबू मेरे स्वास के द्वारा अंदर जाकर उसके स्वाद का एक ग्रंथ खोल दिया हो अब मुख में पानी आने लगा था हमने भी हाथ बढ़ाया जिसे रोकने का प्रयास मेरे मन ने अवश्य किया पर उन कचौड़ीयो का स्वाद लेने के लिए शरीर की इंद्रियां छटपटाती हुई नजर आ रही थी और लग रहा है कि हमारे शरीर में उनका ही वस हो गया है या मैं सम्मोहित हो गया हूं हमने भी लिया जैसे ही हमने एक निवाला खाया तो महसूस किया की घनघोर तपती धूप में शीतल पर मिल गया हो अब मुख में कचौड़ी का स्वाद फैलने लगा था कभी दाल की कुरकुराहाट कभी जीरे का हल्का सा शोधा स्वाद मन को प्रसन्न करने लगा था कभी-कभी बीच में मिर्ची का तीखापन भी स्वाद की गरिमा को तोड़ कर आगे निकाल देती थी अब क्या था वह कचौड़ी भले ही सस्ती थी पर पहली बार भूख हम पर हावी होती हुई दिखी वह स्वाद आज मन में घूम रहा है और रह रह कर दिव्या वह चटनी हरी धनिया को पुदीने के साथ मिलाकर हरी मिर्च डालकर तीखापन शोधापन और ठंडक लिए हुए मस्तिष्क मन और अंतर तृप्ति के लिए सबसे बड़ा उपाय दिखता हुआ नजर आ रहा है और मन पगल होते हुए कचौरी के रूप की परिभाषा लिखने लगा जैसे ही कचौरी तेल में नहाकर बाहर निकली और दूसरी कचौड़ी हमारे प्लेट पर आ गई वह करारा पन हल्की लालिमा लिए हुए और ऊपर की पपड़ी निकाल कर मुख में डाली रायते में डुबाकर अब उसकी कुरकुरी सी आवाज पूरे शरीर में सिहरन पैदा कर गई और मन और उत्सुकता से दूसरे निवाले का इंतजार करने लगा साथ में प्याज इसके स्वाद को चरम सीमा तक बढ़ा देता मन कर रहा है था कि स्वयं ही दुकान पर बैठ जाऊं और बनाता जाऊं खाता जाऊं पर जाना था जब मैं उस दुकान से थोड़ा सा निकला तो हृदय इस तरह प्रतीत करने लगा कि हमने किसी अपने को छोड़ दिया वह आकर्षण शक्ति ना जाने कहां से आई थी ना जाने कहां चली गई पर स्वाद आज भी उसी तरह विद्यमान है कभी-कभी जीवन में हम लोग भी किसी ऐसी चीज का स्वाद ले ले लेते हैं जिसका स्वाद के स्मरण मात्र से ही हमें खुशी प्राप्त होती है ऐसी घटना आपके साथ भी अवश्य हुई होगी।
सुबह स्नान कर जल्दी घर से निकल गया और अपने कार्य क्षेत्र में व्यस्त हो कर भूख को कुछ हद तक भूल गया समय गुजरा उधर अग्नि अब प्रज्वलित होने लगी जिस को शांत करना अब हमें हमारा प्रथम कर्तव्य लगने लगा जो अब सहन के बाहर जा रही थी बाहर निकल कर भोजन की तलाश में इधर-उधर भटकने लगा ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे मैं किसी जंगल में खड़ा हूं हमारे समक्ष वृक्ष को अनेक है पर यह पता नहीं कि किस वृक्ष का फल खाने योग्य है देखने में सभी सुंदर लालिमा लिए हुए जो मुख को लार से भरने के लिए काफी था अब मात्र खुशबू से उन पदार्थों का मन मस्तिष्क चित्रण करने लगा था और उसके स्वाद का अनुभव करते हुए उसके प्रति आकर्षण शक्ति को बढ़ाने लगा था कुछ दूर और चला और देखा कि एक ठेली पर बहुत से लोग खड़े हुए जिन को देख कर मेरे कदम स्वता ही बढ़ने लगे ऐसा लग रहा था कि हमारी नासिका ग्रंथि पागल हो गई है और मुझे उस ओर खींचने लगी है अब मैं बढ़ता ही चला गया और पास जाकर देखा कि गरमा गरम कचौड़ियां निकल रही है और उसकी खुशबू मेरे स्वास के द्वारा अंदर जाकर उसके स्वाद का एक ग्रंथ खोल दिया हो अब मुख में पानी आने लगा था हमने भी हाथ बढ़ाया जिसे रोकने का प्रयास मेरे मन ने अवश्य किया पर उन कचौड़ीयो का स्वाद लेने के लिए शरीर की इंद्रियां छटपटाती हुई नजर आ रही थी और लग रहा है कि हमारे शरीर में उनका ही वस हो गया है या मैं सम्मोहित हो गया हूं हमने भी लिया जैसे ही हमने एक निवाला खाया तो महसूस किया की घनघोर तपती धूप में शीतल पर मिल गया हो अब मुख में कचौड़ी का स्वाद फैलने लगा था कभी दाल की कुरकुराहाट कभी जीरे का हल्का सा शोधा स्वाद मन को प्रसन्न करने लगा था कभी-कभी बीच में मिर्ची का तीखापन भी स्वाद की गरिमा को तोड़ कर आगे निकाल देती थी अब क्या था वह कचौड़ी भले ही सस्ती थी पर पहली बार भूख हम पर हावी होती हुई दिखी वह स्वाद आज मन में घूम रहा है और रह रह कर दिव्या वह चटनी हरी धनिया को पुदीने के साथ मिलाकर हरी मिर्च डालकर तीखापन शोधापन और ठंडक लिए हुए मस्तिष्क मन और अंतर तृप्ति के लिए सबसे बड़ा उपाय दिखता हुआ नजर आ रहा है और मन पगल होते हुए कचौरी के रूप की परिभाषा लिखने लगा जैसे ही कचौरी तेल में नहाकर बाहर निकली और दूसरी कचौड़ी हमारे प्लेट पर आ गई वह करारा पन हल्की लालिमा लिए हुए और ऊपर की पपड़ी निकाल कर मुख में डाली रायते में डुबाकर अब उसकी कुरकुरी सी आवाज पूरे शरीर में सिहरन पैदा कर गई और मन और उत्सुकता से दूसरे निवाले का इंतजार करने लगा साथ में प्याज इसके स्वाद को चरम सीमा तक बढ़ा देता मन कर रहा है था कि स्वयं ही दुकान पर बैठ जाऊं और बनाता जाऊं खाता जाऊं पर जाना था जब मैं उस दुकान से थोड़ा सा निकला तो हृदय इस तरह प्रतीत करने लगा कि हमने किसी अपने को छोड़ दिया वह आकर्षण शक्ति ना जाने कहां से आई थी ना जाने कहां चली गई पर स्वाद आज भी उसी तरह विद्यमान है कभी-कभी जीवन में हम लोग भी किसी ऐसी चीज का स्वाद ले ले लेते हैं जिसका स्वाद के स्मरण मात्र से ही हमें खुशी प्राप्त होती है ऐसी घटना आपके साथ भी अवश्य हुई होगी।

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