Sunday, April 16, 2017

वेदना औरत का पर्याय 

आधुनिक समाज में आज औरत किसी भी पद में पहुंच गई हो यह किसी भी लक्ष्य को हासिल करके अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया हो पर पुरातन काल से ही औरत को वेदना सहना शायद उसके भाग्य में ही लिखा है इस आधुनिक युग में भी औरत पूर्ण रुप से स्वतंत्र नहीं हो पाई और भारत में दूर-दूर तक इसके लक्षण भी दिखाई नहीं देते । सामान्य जीवन में हम जब भी किसी स्त्री को मुस्कुराते हुए देखते हैं तो वह ना जाने कितने कष्टों को अपने मन के अंदर छिपाकर रखती है  जन्म हुआ  तब से  मृत्यु तक संघर्ष करती हुई  प्रतिदिन किसी ना किसी कारणवश अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करती हुई दिखती है पहले जन्म के लिए , और यदि जन्म हो गया तो अल्प अवस्था में ही बाल विवाह करके  उसके बचपन को  समाप्त कर दिया जाता था  और  ना जाने कितनी पीड़ा को सहते हुए जीवन को व्यतीत करना शुरु कर देती थी बच्चे हुए तब कष्ट हुआ मां बनने का सुख तो प्राप्त हो जाता है  पर  उसके पीछे हुए कष्ट का  अनुभव शायद किसी  पुरुष के लिए अनुमान  लगाना  असंभव है  और कभी  कभी  पुत्र प्राप्ति के लिए  ना जाने स्त्री को  कितनी बार  इन कष्टों का सामना करना पड़ता है और  आज भी हम लोग  उस  प्रथा से बाहर नहीं निकले  है जिस तरह कुछ प्रथाओं से नारियों को  स्वतंत्रता प्राप्त हो गई  कभी  पुरुष की मृत्यु होने के बाद  स्वयम को जिंदा जलाने की रीति थी  सती प्रथा ,असहनीय पीड़ा आप इस बात की कल्पना करिए  कि किसी व्यक्ति को  तनिक  जलने में  कितनी पीड़ा होती है तो  उन नारियों की  पीड़ा की  कल्पना करना हम लोगों के बस में  नहीं है बाल विवाह का दंश कभी प्रताड़ित  किए जाने का दंश  कभी  प्रथाओं में  उलझ कर  नारियों का शोषण  इसका दंश  कभी पुत्र प्राप्ति की चाह में हजारों अबोध  बच्चियों की  हत्या  इसका दंश  झेलते हुए  आज नारी  आधुनिकता में पहुंच पाई है  पर क्या आज भी हम  उसको वह सम्मान से देख पा रहे हैं यह वह  सम्मान  जो उसे मिलना चाहिए हम दे पा रहे हैं  नहीं  कभी रस्मों के नाम पर कुप्रथाओं के नाम पर  दंश झेलने वाली स्त्री अपने सम्मान के लिए आज लड़ रही है  और यह लड़ाई ना जाने कितने वर्षों तक चलेगी  और इस पीड़ा को  हम केवल  मुंक दर्शक बन कर ही देख सकते हैं  पर  उसके लिए कोई समाधान यह वर्ग  नहीं निकालना चाहता क्योंकि यदि स्त्री का पद उच्चतम हो जाएगा तो ना जाने कितने क़ी नाक  नीची हो जाएगी  इस प्रथाओं को  समाप्त होते होते  शायद  ना जाने कितने वर्ष बीत जाए   पर  स्त्रियां लड़ रही है अपने लिए  अपनी जैसी कई नारियों के लिए  यही वेदना शायद  उनको  अपने लक्ष्य की प्राप्ति करा दे।  नारी का शोषण  क्योंकि समाज की सोच ऐसी है कि वह नारी को अपने बराबर लाने की चेष्टा तक नहीं करता और उसको उस सम्मान को देने में दर्द होता है जिस सम्मान की वह हकदार है संघर्ष से भरी हुई नारी की कहानी शायद पढ़ने में रोचक लगे पर हकीकत में या एक चिंतनीय विषय है भारत में प्राचीन काल से बाल विवाह की प्रथा कई वर्षों से चली आ रही थी जिसमें अबोध बालिकाओं का विवाह उनसे अधिक उम्र के व्यक्तियों के साथ करा दिया जाता था जिस उम्र में उनको अपनी स्वतंत्रता का बोध भी नहीं होता उस उमर में पतियों के द्वारा  शोषण की शिकार होती और  कितनों की ना जाने मृत्यु  बच्चों के  जन्म के समय ही हो जाती थी और जो बच जाती  उनका शरीर  निष्क्रिय हो जाता हमारे समाज की  यह खूबी रही है की  हम स्त्रियों के दर्द को  हमेशा देखने के आदी हो गए हैं उसके दर्द का आनंद लेते है और इस दर्द को इस पीड़ा को हम मुस्कुराते हुए देखते हैं

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